भौतिक वितरण प्रणाली क्या है ? भौतिक वितरण प्रणाली के प्रबन्ध में निर्णय क्षेत्रों की व्याख्या कीजिए।

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भौतिक वितरण से आशय एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Physical Distribution) जब एक निर्माता वितरण माध्यम को चुन लेता है और विक्रेताओं की नियुक्ति कर लेता है तो उसके समक्ष एक समस्या यह आती है कि वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर किन साधनों से भेजा जाय, कहाँ-कहाँ पर भण्डारगृह बनाये जायें। आदेशों की पूर्ति जल्द से जल्द किस प्रकार की जाय जिससे कि वस्तु को (1) कम-से-कम लागत पर व (2) कम-से-कम समय में भेजा जा सके। यह सभी भौतिक वितरण से सम्बन्धित है।

प्रत्येक उत्पादक का यह दायित्व होता है कि वह उपभोक्ताओं को उचित किस्म की वस्तुएँ, उचित समय व उचित स्थान पर उचित मूल्य पर प्रदान करे। माल के उत्पादन से लेकर उपभोक्ताओं को माल की सुपुर्दगी मिलने तक की जो क्रियाएँ सम्पन्न की जाती है उन्हें भौतिक वितरण में शामिल किया जाता है, जैसे-स्टॉक नियन्त्रण, संग्रहण या भण्डारण, परिवहन, भौतिक बहाव, आदेश आकार नियन्त्रण तथा आदेश प्रतिक्रियाकरण आदि। अन्य शब्दों में कहा जा सकता है कि भौतिक वितरण से आशय उन क्रियाओं के किए जाने से है जिनके द्वारा उत्पाद को उत्पादक से अन्तिम उपभोक्ताओं तक पहुँचाया जाता है।

(1) विलियम जे. स्टाण्टन (William J. Stanton) के अनुसार, “वस्तुओं के भौतिक बहाव का प्रबन्ध और बहाव प्रणाली की स्थापना एवं उसका संचालन भौतिक वितरण में शामिल हैं। ”

(2) कण्डिफ व स्टिल (Cundiff and Still) के अनुसार, “वस्तुओं की उत्पत्ति के बाद लेकिन उपभोग से पहले उसका वास्तविक रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना व संग्रह करना भौतिक वितरण में आता है।”

(3) मैक्कार्थी (McCarthy) के अनुसार, “वैयक्तिक फर्मों के भीतर एवं वितरण प्रणालियों के साथ-साथ माल का वास्तविक उठाना-धरना एवं संचालन भौतिक वितरण है।” संक्षेप में, भौतिक वितरण के द्वारा सभी प्रकार की सही वस्तु सही मात्रा में उस स्थान पर उपलब्ध की जाती है जहाँ उसके लिए माँग उस समय पर विद्यमान हो। इस दृष्टि से विचार करते वितरण निर्माण और मॉंग सृजन के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी है।

भौतिक वितरण का महत्व (Importance of Physical Distribution)

आधुनिक औद्योगिक एवं प्रतिस्पर्द्धा के युग में वस्तुओं के भौतिक वितरण का महत्व बहुत अधिक है। जब कोई उपभोक्ता किसी वस्तु को चाहता है तो उसे वस्तु तुरन्त मिलनी चाहिए। यदि उपभोक्ताओं को वस्तु सही समय पर, उचित मूल्य पर, उचित विक्रय केन्द्र पर मिल जाती है तो इससे एक ओर तो वस्तु के निर्माता को हर समय प्रयत्न करके भौतिक वितरण लागत में कमी करने का प्रयास करना चाहिए ताकि क्रेताओं को वस्तुएँ कम मूल्य पर मिल सकें। भौतिक वितरण के महत्व को निम्न शीर्षकों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है

(1) उत्पादन एवं उपभोग में सामंजस्य भण्डारण सुविधाओं तथा परिवहन सेवाओं के माध्यम से उत्पादन एवं उपभोग में उचित सामंजस्य लाया जा सकता है। भण्डारण सुविधाओं की सर्वाधिक आवश्यकता उन उत्पादकों को होती है जो मौसमी उत्पादन करने वाले उद्योगों को चलाते हैं और वे इन गोदामों की सहायता से नियमित पूर्ति बनाये रखने में सक्षम होते हैं। (2) मूल्यों में स्थायित्व-भौतिक वितरण प्रणाली के माध्यम से मूल्यों में स्थायित्व उत्पन्न किया जाता है। यदि उत्पादक के पास उचित भण्डारण तथा परिवहन सुविधाएँ उपलब्ध हैं तो वह अपनी वस्तु की नियमित पूर्ति विभिन्न स्थानों पर बनाये रख सकता है। यदि पूर्ति ज्यादा हो जाती है तो गोदाम की सहायता से माल की उचित मूल्य होने तक रोका जा सकता है।

(3) वितरण प्रक्रिया में निश्चितता लाना-भौतिक वितरण प्रणाली में लिये जाने वाले निर्णयों से वितरण की लम्बाई व गहराई प्रभावित होती है। अतः वितरण प्रक्रिया निरन्तर चलाने के लिए इसमें निश्चितता लाना आवश्यक है।

(4) क्रय पर प्रभाव-भौतिक वितरण प्रणाली से कच्चे माल का क्रय भी प्रभावित होता है। यदि भण्डारण सुविधाएँ हैं तो अधिक मात्रा में क्रय बचतों को प्राप्त किया जा सकता है। इसके विपरीत यदि भण्डारण सुविधाएँ उपलब्ध नहीं है तो थोड़ी-थोड़ी मात्रा में माल क्रय किया जा सकता है।

(5) स्कन्ध का आकार यदि भौतिक वितरण प्रणाली कुशलतापूर्वक कार्य कर रही है तो उत्पादक द्वारा रखे गये स्टॉक की मात्रा में वृद्धि की जा सकती है। इसके विपरीत, यदि भौतिक वितरण सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं तो स्टॉक की कम मात्रा में वृद्धि रखी जायेगी। अतः उत्पादक द्वारा रखे जाने वाले स्टॉक की मात्रा भौतिक वितरण की कुशलता पर निर्भर करती है।

(6) उत्पाद नियोजन पर प्रभाव-वस्तु के नियोजन एवं विकास कार्य को भौतिक वितरण सम्बन्धी निर्णय प्रभावित करते हैं। उत्पाद का आकार, पैकिंग, वजन आदि से सम्बन्धित निर्णय लेते समय भौतिक वितरण में प्रयोग किये जाने वाले परिवहन के प्रकार, प्रकृति तथा भण्डारण की जगह आदि का उचित चयन किया जाना चाहिए।

(7) वितरण लागतों में कमी-कुशल भौतिक वितरण प्रणाली वितरण लागतों, जैसे- परिवहन, स्टॉक, भण्डारण आदि को कम करके कम्पनी के लाभों में वृद्धि करती है तथा ग्राहकों को सस्ती वस्तुएँ उपलब्ध कराती है

(8) बिक्री का सृजन- एक अच्छी भौतिक प्रणाली द्वारा विक्रय परिणाम का सृजन करती है अर्थात् स्टॉक के ही वर्गीकरण व नियन्त्रण से स्टॉक की कमी की समस्या से बचा जा सकता है। भौतिक वितरण से जो लागत सम्बन्धी बचतें प्राप्त होती है उसे ग्राहकों पर टालकर बिक्री में वृद्धि की जाती है। साथ-ही-साथ कम्पनी तथा ग्राहकों के मध्य अच्छे सम्बन्ध स्थापित किये जा सकते हैं और बिक्री में वृद्धि की जाती है।

भौतिक वितरण में प्रबन्धकों की रुचि बढ़ाना (Increase of Interest of Managers in Physical Distribution)

बाजारों में बढ़ती प्रतियोगिता का सामना करने के लिए विपणन प्रबन्धकों ने भी क्रेताओं की खोज एवं उनके प्रोत्साहन सम्बन्धी कार्यों पर ध्यान देना प्रारम्भ किया है और साथ ही भौतिक वितरण सम्बन्धी समस्याओं की तरफ भी रुचि दिखाई है। उनके इस अध्ययन से यह अनुभव हुआ है कि लागतों में बचत तथा माँग में वृद्धि किया जाना सम्भव है। अतः भौतिक वितरण प्रणाली के प्रति प्रबन्धकों के रुचि बढ़ने के कारण निम्न है

(i) भौतिक वितरण सम्बन्धी सेवाओं की लागतों में निरन्तर वृद्धि होना। (ii) भौतिक वितरण की समस्याओं के अध्ययन द्वारा इसके क्षेत्र में काफी बचत किया जाना सम्भव है।

(iii) भौतिक वितरण की नीतियाँ माँग को प्रोत्साहन देने की क्रिया का एक शक्तिशाली उपकरण

(iv) वास्तविक वितरण लागतों का अध्ययन करने हेतु। भौतिक वितरण में स्टॉक, भण्डार एवं परिवहन की भूमिका (Role of Stock Warehousing and Transport in Physical Distribution)

अथवा भौतिक वितरण के प्रबन्ध में निर्णय क्षेत्र (Decision Areas in Management of Physical Distribution) वस्तुओं के भौतिक वितरण के सम्बन्ध में विभिन्न अवसरों पर निर्णय लेने की आवश्यकता होती है जिससे कि वितरण लागत को कम किया जा सके और क्रेता को उचित सन्तुष्टि दी जा सके। अतः वितरण के सम्बन्ध में कुछ निर्णय क्षेत्र हैं जिनके विषय में निर्णय लेना प्रबन्ध का काम है। यह क्षेत्र निम्न प्रकार हैं

(1) स्टॉक का आकार सम्बन्धी निर्णय-वस्तुओं के भौतिक वितरण के प्रबन्ध में सबसे पहले यह निर्णय लेना होता है कि वस्तुओं के उचित बहाव के लिए कितना स्टॉक रखना आवश्यक है ? इसके दो भाग हो सकते हैं एक तो अधिकतम व दूसरा न्यूनतम अधिकतम का अर्थ है किसी निर्धारित सीमा तक ही वस्तु का स्टॉक रखा जा सकता है और न्यूनतम का अर्थ है किसी भी समय उस वस्तु का स्टॉक उस निर्धारित सीमा से कम नहीं होना चाहिए। यह दोनों निर्णय व्यवसाय की बिक्री के पूर्वानुमान और लागत पर आधारित होते हैं। बिक्री का पूर्वानुमान जितना अधिक सही होगा, उतने ही अधिक अवसर व्यवसाय के लाभ को बढ़ाने के होंगे। स्टॉक को भौतिक वितरण हेतु रखने के लिए उस पर व्यय भी करना होगा, जैसे उसमें लगी पूँजी पर ब्याज देना, उसका बीमा कराना, रखी वस्तुओं में छीजन भी होगी। स्टॉक के आकार के सम्बन्ध में निर्णय लेते समय प्रबन्ध को इन व्ययों का भी उचित ध्यान रखना चाहिए । वस्तुओं के भौतिक वितरण में स्टाक एक महत्वपूर्ण अंश है। बिना उचित मात्रा के स्टॉक के आदेशों की पूर्ति उचित रूप से नहीं की जा सकती है। उन्हें विश्वास है कि उनके आदेशों की पूर्ति एक निश्चित समय में अवश्य हो जायेगी। अतः आवश्यकता यह है कि स्टॉक उचित मात्रा में अवश्य ही रखा जाना चाहिए।

(2) भण्डार सम्बन्धी निर्णय-वस्तुओं के भौतिक वितरण के लिए उनका भण्डारण करना अत्यन्त आवश्यक है जिससे आवश्यकता के समय आदेशों को पूरा किया जा सके। लेकिन अब प्रश्न यह है कि वस्तुओं का भण्डारण कहाँ पर किया जाय ? इसके लिए विकल्प हैं-(1) फैक्ट्री के अन्दर या उसके पास या किसी केन्द्रीय स्थान पर, (2) कुछ वितरण स्थानों पर, व

(3) कई वितरण स्थानों पर एक संस्था के प्रबन्धक को इन विकल्पों पर निर्णय लेना होगा और जब कुछ या कई स्थानों का निर्णय लिया जायेगा तो फिर यह निर्णय लेने होंगे कि (अ) भण्डारण किन शहरों या स्थानों पर हो, (ब) शहरों के निर्णय के साथ यह भी निर्णय लेना होगा कि शहरों में किन क्षेत्रों या मोहल्लों में यह सुविधाएँ प्रदान की जायें, (स) यह भण्डारण संस्था के निजी हों या किराये के साधारणतया भण्डारण निम्न प्रकार के होते हैं (i) निजी भण्डारण-वे भण्डार जो निजी व्यक्तियों या संस्थाओं के द्वारा अपना माल रखने के लिए बनाये व चलाये जाते हैं उन्हें निजी भण्डार कहते हैं। साधारणतया इस प्रकार के भण्डार बड़े थोक व्यापारी या बड़े निर्माताओं के द्वारा माल रखने के लिए बनाये जाते हैं। (ii) सार्वजनिक भण्डारण-ये भण्डार बड़े शहरों में स्थापित होते हैं। इनमें साधारणतया जनता के द्वारा माल या पदार्थ रखे जाते हैं। इन भण्डारों पर राज्य द्वारा निर्धारित शुल्क लिया जाता है। इनका स्वामित्व निजी, सहकारी या सार्वजनिक कम्पनी के रूप में से कोई भी हो सकता है। यह भण्डार साधारण या विशेष दोनों प्रकार के हो सकते हैं। साधारण में सभी प्रकार का माल रखा जा सकता है जबकि विशेष पदार्थ ही रखे जा सकते हैं।

(iii) सरकारी भण्डारण ये भण्डार सरकार (केन्द्र व राज्य) तथा अर्द्ध-सरकारी संस्थाओं (जैसे-नगरपालिकाएँ, नगर महापालिकाएँ, जिला परिषदें, आदि) के द्वारा स्थापित किये जाते हैं।

(iv) बन्धक भण्डारण-वे भण्डार जो सरकार को उनके यहाँ भण्डार में रखे माल पर आबकारी या आयात कर देने का बॉण्ड भरते हैं, बन्धक भण्डार कहे जाते हैं। इनका संचालन सरकारी नियमों के अनुसार होता है। इन गोदामों में वस्तुएँ तब तक रखी रहती हैं जब तक कि उनका स्वामी उन पर कर नहीं चुका देता।

(v) शीत भण्डारण- इस प्रकार के भण्डारों में इच्छानुसार तापमान रखने के लिए मशीनें लगी होती हैं। भण्डारों में वे पदार्थ रखे जाते हैं जिनको यदि साधारण तापमान में रखा जाता है तो वे जल्दी खराब हो जाते हैं, जैसे- फल, मक्खन, अण्डे, तरकारी आदि। यह भण्डार निजी व सरकारी दोनों प्रकार के हो सकते हैं।

(3) परिवहन सम्बन्धी निर्णय बिना स्टॉक व भण्डार को ध्यान में रखे परिवहन सम्बन्धी निर्णय नहीं लिया जा सकता है। वस्तुओं को ग्राहकों तक कई साधनों से पहुँचाया जा सकता है। यह साधन 6 प्रकार के है-(i) सड़क, (ii) मोटर, ट्रक, (iii) रेलें, (iv) नल, (v) जल, व (vi) वायुयान इन साधनों के बारे में निर्णय करते समय प्रत्येक साधन की लागत का ध्यान अवश्य ही रखा जाना चाहिए। यह सभी साधन वस्तुओं में स्थापित उपयोगिता को उत्पन्न करते हैं।

(4) वस्तुओं का चढ़ाना-उतारना सम्बन्धी निर्णय-वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के लिए परिवहन साधनों में चढ़ाया जाता है और फिर वहाँ पहुँचकर उन्हें उतारा जाता है। व्यवसाय के प्रबन्ध को इस सम्बन्ध में भी निर्णय लेने पड़ते हैं कि किस प्रकार वस्तु को चढ़ाया या. उतारा जाय जिससे उस पर व्यय कम-से-कम पड़े प्रबन्ध का यह उत्तरदायित्व है कि वह इस बात का पता लगाये कि कौन-कौन सी मशीनों का प्रयोग इस सम्बन्ध में किया जा सकता है और किस प्रकार इस लागत को घटाया जा सकता है।

(5) आदेश का आकार सम्बन्धी निर्णय आदेश का आकार भी वस्तु के वितरण सम्बन्धी नियमों को प्रभावित करता है। यदि वस्तु के सम्बन्ध में आदेश पूरी पेटी के लिए नहीं आते हैं अर्थात् छोटी मात्रा में आते हैं तो भेजने पर अधिक व्यय करना होगा। यदि आदेश बड़ी मात्रा में आते हैं तो उनकी पूर्ति पूरा ट्रक भेजकर या पूरा रेल का डिब्बा किराये पर लेकर की जा सकती है। इस प्रकार आदेशों की पूर्ति के लिए साधन सम्बन्धी निर्णय प्रबन्ध को लेने पड़ते हैं जो आदेश की मात्रा के अनुसार होते हैं।

(6) आदेश को पूरा करने की रीति सम्बन्धी निर्णय- एक संस्था के प्रबन्ध को वस्तुओं के भौतिक वितरण के सम्बन्ध में यह निर्णय भी लेना पड़ता है कि वस्तुओं के सम्बन्ध में प्राप्त आदेशों को संस्था किस प्रकार से पूरा करेगी। यदि आदेशों को एक उचित समय के भीतर पूरा कर दिया गया तो संस्था की ख्याति में वृद्धि होगी और व्यवसाय की उन्नति करने का अवसर मिलेगा लेकिन यदि इसके विपरीत स्थिति रही तो आदेश देने वाले को हानि हो सकती है और संस्था के लिए भी ऐसे ग्राहकों को छोड़कर जा सकने की सम्भावनाएँ बढ़ जाती है।

भौतिक वितरण व्यवस्था को निर्धारित/प्रभावित करने वाले घटक (Factors Determining/Affecting Physical Distribution System)

भौतिक वितरण व्यवस्था को निर्धारित/प्रभावित करने वाले प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं (1) बाजार (Market)-किसी कम्पनी की भौतिक वितरण व्यवस्था को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण घटक उसके बाजार का आकार एवं उसकी संरचना है। उदाहरण के लिए, बड़े आकार वाला बाजार बहुत दूर से भी उत्पादों को अपनी और आकर्षित करता है और इसके परिवहन का महत्व अधिक होता है। वितरण सुविधाएँ उन बाजार क्षेत्रों में केन्द्रित हो जाती हैं जहाँ पर जनसंख्या का घनत्व अधिक हो एवं उच्च आय वर्ग के उपभोक्ता निवास करते हों।

(2) उत्पाद (Product)- यह दूसरा महत्वपूर्ण घटक है जोकि वितरण व्यवस्था को निर्धारित अथवा प्रभावित करता है। उत्पाद की चयन व्यवस्था को प्रभावित करने वाली विभिन्न विशेषताओं में निम्न विशेषताएँ प्रमुख हैं-(i) मूल्य, (ii) नाशवानता तथा (iii) उत्पाद पंक्ति की चौड़ाई उत्पाद मूल्य का प्रभाव स्टॉक स्तर तथा परिवहन लागत पर पड़ता है। मूल्य जितना अधिक होगा, स्टॉक लागत उतनी ही अधिक होगी। इसके विपरीत, जितनी मूल्य कम होगा, स्टॉक लागत उतनी ही कम होगी। जहाँ तक परिवहन लागत का प्रश्न है, उच्च मूल्य वाले उत्पाद की परिवहन लागत कम होती है। यदि कोई उत्पाद अत्यधिक नाशवान हो, जैसे-दूध, अण्डे, हरी सब्जी आदि तो उसे तुरन्त बाजार में बिकने के लिए भेज दिया जाना चाहिए चाहे परिवहन की लागत अधिक ही क्यों न हो। इस प्रकार नाशवान उत्पादों में स्टॉक करने की समस्या कम होती है किन्तु परिवहन तथा उतार-चढ़ाव की समस्याएँ अधिक होती हैं।

(3) वितरण वाहिकाएँ (Distribution Channels)-कम्पनी द्वारा उपयोग की जाने वाली वितरण वाहिका भी उसकी भौतिक वितरण व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। जैसे यदि कोई कम्पनी उत्पाद के भौतिक वितरण के लिए थोक व्यापारी की सेवाएँ लेती है तो वह बड़ी मात्रा में उत्पादों को भेजकर वितरण लागत में कमी ला सकती है इसमें स्टॉक लागत तथा संग्रहालय लागत भी कम पड़ेगी। इसके विपरीत, यदि कम्पनी उपभोक्ताओं को प्रत्यक्ष रूप में उत्पादों का विक्रय करती है तो उसमें लघु आदेश, उतार-चढ़ाव, अधिक स्टॉक लागत, अधिक संग्रहालय लागत तथा अधिक परिवहन लागत पड़ेगी किन्तु मध्यस्थों का उपयोग करके भौतिक वितरण लागत में पर्याप्त कमी लायी जा सकती है।

(4) संसाधन स्थिति (Resource Position)-कम्पनी की भौतिक वितरण व्यवस्था पर उसके पास उपलब्ध संसाधनों का भी प्रभाव पड़ता है। जैसे-यदि कम्पनी अधिक तरलता चाहती है तथा अपने रोकड़ प्रवाह में तेजी लाना चाहती है तो वह उत्पाद का निम्न स्टॉक तथा तेज परिवहन का उपभोग कर सकती है। ऐसी स्थिति में उसे उत्पाद की मात्रा की तुलना में अधिक किराया देना पड़ेगा किन्तु यदि कम्पनी के पास संसाधनों की कमी है तो वह शाखा संग्रहालयों की स्थापना कर सकती है और माल भेजने की व्यवस्था का केन्द्रीकरण कर सकती है। ऐसी स्थिति में उत्पादों का धीमी गति से भौतिक वितरण होगा किन्तु परिवहन लागत में कमी आ जायेगी।

(5) संघटक उपलब्धता (Component Availability)-भौतिक वितरण सुविधाओं की उपलब्धता भी भौतिक वितरण व्यवस्था के रूप का निर्धारण करती है। यह देखा गया है कि आवश्यकता पड़ने पर हमें सदैव संग्रहालय के लिए समुचित स्थान, परिवहन का ढंग तथा उत्पाद के उतार-चढ़ाव की सामग्री उस आकार एवं रूप में उपलब्ध नहीं होती जिसकी हमें जरूरत होती है। ऐसी स्थिति में कम्पनियों को किसी अन्य श्रेष्ठतम विकल्प का सहारा लेना पड़ता है।

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