“विपणन उपयोगिता को सृजन करती है।” विपणन की प्रकृति एवं क्षेत्र की विवेचना कीजिए।

0
146

विपणन का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Marketing)

आधुनिक समय में ‘विपणन’ शब्द से अधिकांश व्यक्ति परिचित हैं परन्तु ऐसे व्यक्तियों की संख्या बहुत ही कम है जो कि विपणन शब्द का वास्तविक अर्थ जानते हैं। इसके अतिरिक्त अत्यन्त हास्यप्रद विषय तो यह है कि अधिकांश व्यक्ति जो कि विपणन कार्य में संलग्न है, वे भी विपणन शब्द के वास्तविक अर्थ से पूर्णरूप से परिचित नहीं है। विपणन को विभिन्न लोगों ने अलग-अलग ढंग से व्यक्त किया है। लोगों की एक बड़ी संख्या विपणन को विक्रय मानती है, जबकि कुछ लोग इसे क्रय कहना अधिक पसन्द करते हैं। इसी प्रकार कुछ अन्य लोग इसे क्रय-विक्रय कहते हैं। सामान्य रूप से एक विपणन प्रबन्ध के स्तर का व्यक्ति भी विपणन का अर्थ विक्रय से लेता है। एक सामान्य कृषक के लिये कृषि उपज को बाजार में विक्रय करना ही विपणन है। एक सामान्य उपभोक्ता का अपनी आवश्यकता की पूर्ति हेतु वस्तु का क्रय करना ही विपणन है। इसी प्रकार एक विक्रेता के द्वारा वस्तुओं की बिक्री करना ही विपणन कहा जाता है। परन्तु वास्तव में इन विचारों को ही विपणन समझना भ्रमपूर्ण है, क्योंकि विपणन शब्द का वास्तविक अर्थ इससे कहीं अधिक विस्तृत है। विपणन के अन्तर्गत विक्रय के साथ-साथ विक्रय से पूर्व एवं पश्चात् की उन सभी क्रियाओं को शामिल किया जाता है जो एक व्यवसायी के मस्तिष्क में वस्तु के उत्पादन से प्रारम्भ हो जाती है और वस्तु विक्रयोपरान्त उपभोक्ता की अधिकतम सन्तुष्टि तक बनी रहती है। अतः विपणन एक प्रक्रिया है जो मानवीय इच्छाओं एवं आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले उत्पादों एवं उद्देश्यों के सृजन, मूल्य निर्धारण, वितरण एवं संवर्द्धन द्वारा संगठनात्मक उद्देश्यों की पूर्ति में महत्वपूर्ण योगदान देती है।

(1) जे. एफ. पायले (J. F. Pyle) के अनुसार, “विपणन में क्रय तथा विक्रय की क्रियाएँ शामिल हैं।” (Marketing comprises both buying and selling activities.)

(2) क्लार्क एवं क्लार्क (Clark and Clark) के अनुसार, विपणन में सभी प्रयत्न सम्मिलित हैं जो वस्तुओं एवं सेवाओं के स्वामित्व हस्तान्तरण एवं उनके भौतिक वितरण में सहायता प्रदान करते है।” (Marketing consists of there efforts which affect transfers in the ownership of goods and services and provide for their physical distribution.)

(3) फिलिप कोटलर (Philip Kotler) के अनुसार, “विपणन वह मानवीय क्रिया है जो विनिमय प्रक्रियाओं के द्वारा आवश्यकताओं एवं इच्छाओं की सन्तुष्टि के लिए की जाती है। (Marketing is human activity directed at satisfying needs and wants through exchange process.)

(4) कण्डिफ, स्टिल एवं गोवोनी (Cundiff Still and Govoni) के अनुसार, “विपणन वह प्रबन्धकीय प्रक्रिया है जिसके द्वारा उत्पादों का मिलान बाजारों से किया जाता है एवं उसी प्रकार स्वामित्व का हस्तान्तरण किया जाता है। ” (Marketing is the managerial process by which products are matched with markets and through which transfers of ownership are affected.)

(5) मैक्कार्थी (Mecarthy) के अनुसार, “उपभोक्ताओं की माँग की अपेक्षाओं के अनुरूप उत्पादन क्षमता को समायोजित करके आवश्यकता का व्यवसायियों द्वारा प्रत्युत्तर देना ही विपणन है। ” (Marketing is the response of business to the needs to adjust production capabilities to the requirements demands.)

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि “विपणन एक सामाजिक, आर्थिक एवं मानवीय प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत उपभोक्ताओं की इच्छाओं एवं आवश्यकताओं के अनुरूप उपयुक्त किस्म की वस्तुओं एवं सेवाओं का समुचित मात्रा में उत्पादन करके उन्हें विनिमय द्वारा उपभोग के लिए समर्पित किया जाता है, जिससे उनकी सन्तुष्टि हो एवं रहन-सहन के स्तर में सुधार हो ।


विपणन की प्रकृति (Nature of Marketing)

विपणन की प्रकृति को निम्न शीर्षकों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है (1) विपणन एक मानवीय क्रिया है-विपणन मूल रूप में एक मानवीय क्रिया है जिसके अन्तर्गत मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति मानवीय क्रियाओं द्वारा की जाती है। यह मानवीय सन्तुष्टि

के लिए किया गया मानवीय प्रयास है। (2) विपणन सामाजिक-आर्थिक क्रिया है-विपणन एक सामाजिक-आर्थिक क्रिया है जिसका

उद्देश्य समाज के प्राणियों की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि करके उचित लाभ कमाना है।

(3) विपणन गतिशील प्रक्रिया है-विपणन सर्वाधिक गतिशील प्रक्रिया है। विपणनकर्ता सदैव तेजी से बदलते हुए फैशन, बाजार प्रवृत्तियों, ग्राहक रुचियों, ग्राहक माँगों, पसन्द एवं आधुनिक परिवर्तनों पर ध्यान केन्द्रित करता है।

(4) विपणन एक विनिमय प्रक्रिया है-विपणन एक विनिमय प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत उत्पादन एवं सम्भावित उपभोक्ता के मध्य मूल्य के बदले वस्तु, सेवा अथवा अन्य उपयोगी वस्तुओं का आदान-प्रदान होता है।

(5) विपणन एक प्रणाली है-विपणन एक ऐसी प्रणाली है जिसमें अनेक क्रियाएँ सम्मिलित हैं जो परस्पर सम्बन्धित हैं तथा एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं, जैसे-सन्तुलन एवं प्रभावी विपणन संगठन की स्थापना करना। फिलिप कोटलर के अनुसार, “विपणन प्रणाली उन महत्वपूर्ण संस्थाओं और प्रवाहों का समूह है जो एक संगठन को उसके बाजारों से जोड़ता है।”

(6) विपणन आय सृजन करता है-विपणन की इस प्रकृति के अनुसार, आय का सृजन करने वाली सभी क्रियाएँ विपणन में आती है विपणन से आय का सृजन होता है और आय से व्यवसाय का विकास होता है जो दिन दूनी रात चौगुनी’ से पनपता है।

(7) विपणन क्रियात्मक-विपणन की इस प्रकृति के अनुसार विपणन उन क्रियाकलापों का अध्ययन करता है जो उत्पादन केन्द्रों से उपभोग केन्द्रों तक वस्तुएँ पहुँचाने से सम्बन्धित होती है।

(8) विपणन कला एवं विज्ञान दोनों है-यदि देखा जाए तो विपणन कला एवं विज्ञान दोनों ही हैं। विपणन सही स्थान पर, सही रूप से, सही हाथों तक, सही समय पर, सही मूल्यों पर एवं सही किस्म का माल पहुँचाने की कला है। साथ ही यह गतिशील एवं विकासशील विज्ञान भी है क्योंकि यह पूर्ति को माँग के अनुरूप बनाये रखने पर जोर देता है। इस सबके होने पर भी विपणन को भौतिक विज्ञान की श्रेणी में रखना उपयुक्त नहीं है। हम इसे चिकित्सा तथा इन्जीनियरिंग की श्रेणी में रख सकते हैं।

(9) विपणन उपयोगिताओं का सृजन करना है-विपणन उपयोगिताओं का सृजन करने वाली क्रिया है। अर्थशास्त्र के छात्र जानते हैं कि उपयोगिता मुख्य रूप में निम्न चार प्रकार की होती है (i) रूप उपयोगिता (Form Utility), (ii) समय उपयोगिता (Time Utility), (iii) स्थान उपयोगिता (Place Utility) तथा (iv) स्वामित्व उपयोगिता (Ownership Utility) । विपणन इन चारों प्रकार की उपयोगिताओं का सृजन करती है।

(10) विपणन जीवन स्तर प्रदान करना-विपणन समाज को जीवन स्तर प्रदान करता है। जिस क्षेत्र में विपणन जितना अधिक प्रगति कर गया है, उस क्षेत्र के लोगों का जीवन स्तर उतना ही ऊँचा है। इसकी स्पष्ट झलक मुम्बई नगर में रहने वाले लोगों के रहन-सहन तथा मुम्बई में ही झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के रहन-सहन के स्तर को देखने में मिलती है। विकसित देशों में निवास करने वाले व्यक्ति आज उच्च जीवन स्तर का उपभोग इस कारण कर रहे हैं क्योंकि वहाँ पर विपणन प्रगति की चरम सीमा पर है। इसके विपरीत, अविकसित देशों में रहने वाले व्यक्ति निम्न श्रेणी के जीवन स्तर का उपभोग इस कारण कर रहे हैं क्योंकि वहाँ पर विपणन अत्यन्त पिछड़ी अवस्था में है।


विपणन का क्षेत्र (Scope of Marketing)

प्राचीन समय में विपणन का क्षेत्र काफी संकुचित था। उस समय विपणन का केन्द्र उपभोक्तान होकर वस्तु का उत्पादन करना था। उपभोक्ताओं की आवश्यकतायें भी काफी सीमित थीं। वर्तमान समय में उपभोक्ताओं की बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विपणन का क्षेत्र भी व्यापक होता जा रहा है। फलस्वरूप आज विपणन की क्रियाओं का क्षेत्र माल का उत्पादन प्रारम्भ होने से पूर्व ही आरम्भ हो जाता है और माल के विक्रय होने के बाद तक जारी रहता है। वस्तुतः जब तक उपभोक्ता माल के उपयोग से सन्तुष्ट नहीं हो पाता है तब तक विपणन का क्षेत्र बना रहता है। इस सम्बन्ध में प्रो. एम. नायर ने कहा है कि “विपणन समाज के लिए जीवन स्तर का निर्माण करके समाज को ही प्रदान करता है और उनकी आवश्यकताओं का ज्ञान प्राप्त करके उसकी पूर्ति करता है। समाज की बदलती हुई आवश्यकताओं, आदतों एवं फैशनों के अनुरूप वस्तु को ढालने का कार्य विपणन द्वारा ही किया जाता है।” विपणन के क्षेत्र को निम्न शीर्षकों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है.-

(1) उपभोक्ता व्यवहार का अध्ययन-आधुनिक विपणन क्रियाओं की शुरुआत उपभोक्ता व्यवहार के अध्ययन से होती है। उपभोक्ता व्यवहार के अन्तर्गत यह अध्ययन किया जाता है कि उपभोक्ताओं द्वारा किस वस्तु को, कितनी मात्रा में, किस मूल्य पर, कब खरीदना पसन्द करता है। अतः उपभोक्ता व्यवहार के अध्ययन में उपभोक्ता की रूचि, स्वभावों, आदतों और उनकी आय के बारे में आँकड़े एकत्रित किये जाते हैं और उनका विश्लेषण करके वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है जिससे वस्तु का विपणन आसानी से हो सके और उत्पादन को किसी प्रकार का नुकसान न हो।

(2) वस्तु नीतियों का निर्धारण-आधुनिक विपणन क्रियाओं में उपभोक्ता व्यवहार का अध्ययन के बाद वस्तु नीतियाँ निर्धारित करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसके अन्तर्गत वस्तु का रंग, रूप, डिजाइन, आकार, ब्राण्ड, ट्रेडमार्क, लेबिल आदि बातों पर ध्यान दिया जाता है।

(3) बाजार विभक्तिकरण–बाजारों का वर्गीकरण या विभक्तिकरण करना विपणन के क्षेत्र का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य है। इस कार्य के अन्तर्गत सम्पूर्ण बाजार में विद्यमान एवं सम्भाव्य ग्राहकों का पता लगाकर उन्हें उनकी विशेषताओं, आवश्यकताओं, इच्छाओं व रुचियों के आधार पर विभिन्न समूहों या उप-समूहों में बाँटा जाता है। बाजारों का भौगोलिक आधार पर ही वर्गीकरण किया जाता है। ग्राहकों को उनकी आयु, आय, शिक्षा, परिवार आकार, लिंग आदि के आधार पर भी वर्गीकृत किया जाता है।

बाजार वर्गीकरण का उद्देश्य सभी प्रकार के ग्राहकों की आवश्यकताओं, रुचियों तथा इच्छाओं की सन्तुष्टि करना है।

(4) विपणन अनुसन्धान–’विपणन अनुसन्धान’ विपणन के क्षेत्र में शामिल एक महत्वपूर्ण क्रिया है। इसका तात्पर्य विपणन सम्बन्धी विभिन्न तथ्यों की खोज एवं विश्लेषण करना है, ताकि विपणन समस्याओं के उचित हल ढूँढ़े जा सकें। विपणन अनुसन्धान विपणन का एक आधारभूत एवं प्राथमिक कार्य है।

(5) मूल्य नीतियों का निर्धारण-इसके अन्तर्गत बाजार में बेची जाने वाली वस्तुओं या सेवाओं के मूल्य निर्धारित किये जाते हैं। मूल्य निर्धारित करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि वस्तुओं से ग्राहकों को उस मूल्य के चुकाने से कितना लाभ या हित हो रहा है। यदि चुकाये जाने वाले मूल्यों की तुलना में ग्राहकों को लाभ या हित कम हो तो वे वस्तु क्रय करना पसन्द नहीं करेंगे। ऐसी स्थिति में व्यवसायी को अपनी लागतों में कमी करके या लाभों की दरों में कमी करके मूल्यों को कम करना होगा, किन्तु यदि वस्तुओं के लिए चुकाये गये मूल्यों की तुलना में ग्राहकों को लाभ अधिक होता है तो व्यवसायी भविष्य में मूल्य वृद्धि भी कर सकता है और अधिक लाभ अर्जित कर सकता है।

((6) प्रोमोशन सम्बन्धी निर्णय विपणन के क्षेत्र में प्रोमोशन सम्बन्धी निर्णय क्रिया को भी शामिल किया जाता है। इस क्रिया के अनुसार यह निश्चय किया जाता है कि वस्तु को पर्याप्त मात्रा में बेचा जाए। इसीलिए विक्रय सम्बन्धी प्रोमोशन का सहारा लिया जाता है, जैसे-वस्तु का विज्ञापन टी. वी. पर, सिनेमागृह में या प्रसार प्रचार गाड़ी द्वारा कराया जाये। इन सभी बातों का निर्णय वस्तुओं के विपणन करने से पूर्व लिया जाता है।

(7) वितरण के माध्यम का निर्धारण-इसके अन्तर्गत वस्तु को उपभोक्ता तक पहुँचने तक की व्यवस्था की जाती है। इसके लिए यह व्यवस्था की जाती है कि वस्तु का वितरण किस माध्यम से किया जाए। थोक व्यापारी के द्वारा, फुटकर व्यापारी के द्वारा या व्यक्तिगत सम्पर्क के द्वारा इन सभी पहलुओं पर विश्लेषण किया जाता है। साथ-ही-साथ यह भी निश्चय किया जाता है कि वस्तु के वितरण में कम-से-कम खर्च आए और लाभ अधिक-से-अधिक हो।

(8) विक्रय के बाद सेवा-विपणन में विक्रय के बाद सेवा क्रिया को शामिल किया गया है। इस क्रिया के अनुसार वस्तु का विक्रय करने के बाद उपभोक्ता को मुफ्त मरम्मत सेवा, मुफ्त सफाई सेवा या एक निश्चित समय में खराब होने पर वापसी की सेवा को शामिल किया जाता है जिससे ग्राहक सन्तुष्ट हो और भविष्य में वस्तुओं की खरीद कर सकें।


विपणन के कार्य (Functions of Marketing)

विपणन कार्यों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है (1) वस्तु नियोजन एवं विकास करना-आधुनिक विपणन विचारधारा में उपभोक्ता सन्तुष्टि सर्वोपरि है। अतः उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं का पता लगाकर नयी-नयी वस्तुओं को विकसित किया जाता है तथा उपभोक्ता की परिवर्तित रुचियों, प्रवृत्तियों एवं आदर्शों के अनुसार वस्तु नियोजन कर वस्तु में परिवर्तन किये जाते हैं जिससे कि वस्तु अप्रचलित न हो जाए तथा व्यवसाय बन्द होने से अपने आपको बचा सके। इस प्रकार विपणन का यह सबसे प्रमुख कार्य है।

(2) प्रमापीकरण एवं श्रेणीकरण करना-बाजार के विस्तार के लिए यह आवश्यक है कि क्रेता एवं विक्रेता बिना वास्तविक रूप से वस्तु का निरीक्षण किये खरीद व बिक्री कर सकें, लेकिन इस प्रकार की खरीद व बिक्री के लिए प्रमाप व श्रेणीकरण की आवश्यकता होती है। वस्तु के गुण, किस्म, आकार, रंग, आदि के आधार पर प्रमाप निर्धारित किये जाते हैं। प्रमाप के निर्धारित होने पर श्रेणीकरण किया जाता है। प्रमापीकरण व श्रेणीकरण होने से खरीद एवं बिक्री में सुगमता, उत्पादन में एकरूपता, मूल्यों में समानता व व्यापक बाजार, आदि से उत्पादक एवं उपभोक्ता दोनों को लाभ होता है।

(3) क्रय करना-यह क्रय उपभोक्ता के द्वारा तो उपभोग के लिए किया जाता है लेकिन उत्पादक एवं मध्यस्थ के द्वारा तो बेचने के लिए ही किया जाता है। वास्तव में इन दोनों का कार्य एकत्रीकरण करना है। इस प्रकार क्रय एवं एकत्रीकरण दोनों ही विपणन के अंग हैं। उत्पादक द्वारा वस्तुओं को परिवर्तित किया जाता है जबकि मध्यस्थ सामान्यतया ऐसा नहीं करता है लेकिन दोनों के द्वारा वस्तुओं को क्रय किया जाता है।

(4) विक्रय करना- विपणन में विक्रय कार्य बहुत ही महत्वपूर्ण है। वास्तव में, विपणन की आधारशिला विक्रय ही है। यदि वस्तुओं का विक्रय न हो तो विपणन क्रिया । अन्य कार्य अप्रभावी ही रह जायेंगे। बिना विक्रय के उत्पादन को भी अधिक काल तक चालू नहीं रखा जा सकता है।

(5) परिवहन साधनों की व्यवस्था करना परिवहन का कार्य वस्तु को उत्पादन स्थल से – उपभोक्ता तक पहुँचाना है। परिवहन की सहायता के कारण ही बृहत् उत्पादन, विशिष्टीकरण व वृहत् बाजार स्थापित हो गये हैं। उपभोक्ता को भी उपभोग की वस्तुओं की संख्या व मात्रा में वृद्धि करने का अवसर परिवहन की सहायता से ही प्राप्त हुआ है। व्यापार व परिवहन जुड़वां भाई की तरह हैं। दोनों का विकास साथ-साथ होना चाहिए। यदि इनमें से किसी एक की भी वृद्धि रुकती है तो दूसरे की स्वतः ही रुक जाती है।

(6) वित्त व्यवस्था करना- आधुनिक उत्पादन व उपभोग के बीच समय का काफी अन्तर होता है। उपभोक्ता भी वस्तु प्राप्त करने के लिए पहले से भुगतान नहीं करता है। उत्पादन में कच्चा माल, मशीन, तेल, मजदूरी व संग्रह आदि के लिए भी धन की आवश्यकता होती है। साथ ही दैनिक कार्यों, मौसमी आवश्यकताओं, क्रेता की साख आदि लेने के लिए भी धन की आवश्यकता होती है। धन व साख जिसकी आवश्यकता वस्तु को अन्तिम उपभोक्ता तक पहुँचाने के लिए होती है विपणन में वित्त कार्य कहलाता है।

(7) जोखिम सहन करना-जोखिम अनिश्चितता के कारण उत्पन्न होती है। वस्तु के उत्पादन से लेकर अन्तिम उपभोक्ता तक पहुँचाने में बहुत सी क्रियाएँ करनी पड़ती हैं जिनमें जोखिम सहना भी होता है। कभी तो जोखिम माल को आग, बाढ़, दुर्घटनाओं व चोरी से नष्ट होने की होती है तो कभी जोखिम माल का मूल्य कम होने की तो कभी माँग में परिवर्तन होने की होती है। इनमें कुछ जोखिमें ऐसी हैं जिनको बीमा, आदि से हटाया जा सकता है, कुछ के प्रभाव को कम किया जा सकता है। विपणन के कार्यों में जोखिम का भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है।

(8) बाजार सूचना एकत्र करना- विपणन में बाजार सूचनाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य करती है। यदि बाजार सूचनाओं का व्यापारी के पास अभाव है तो उसके व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। विभिन्न व्यापारिक समुदायों, सरकार व अन्य विशिष्ट संस्थानों द्वारा वस्तु के उत्पादन व उपभोग के सम्बन्ध में सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं। व्यापारी उन सूचनाओं के आधार पर अपनी विपणन नीति व वस्तु के उत्पादन में परिवर्तन कर लेता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here